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आत्मविश्वास

16th September 2025

है ज़रूर एक ख़्वाब अभी,

जो ख़्वाब न जाने सोता है।

क्यों बेमतलब तू रोता है?

जगा के आई आशाएँ कभी,

ग़म में भी तो पल होते हैं।

जब इस पल में है तू ज़िंदा यहीं,

आज इन आशाओं की बगिया में सोते हैं।

फिर ले आया दिल अभी,

जो दिल चाहता है तुझसे नीयत।

जिस राह की तलाश में है — वो मिल गई,

वो राह है जो तू न समझेगा।

अँधेरे से ख़ुद को मुक्त कर,

बना अपनी राहें।

जिस दिन, जिस रात,

जो हँसी, जो बात,

ख़ुशी और आशा के साथ

भर दे हर पल को।

न जाने कोई, न जाने आज,

जिस राह पे चल रहे हैं हम।

इस दिशा की समझ और फिर समझौतों में भूल जा,

क्योंकि एक नया दिन है आज।

है अभी एक दिल सही,

जो क्यों बेमतलब चाहता है,

क्यों बेमतलब चाहता है।

जिन लाखों पलों में दो ख़ुशी,

जिस दुविधा में हैं गुम,

यही तो हैं कुदरत के रंग।